आंखों से सत्य देखो!

सूर्य की ओर जैसे कोई आंखें बंद किये रहे, ऐसे ही हम जीवन की ओर किये हैं। और, तब हमारे चरणों का गड्ढों में चले जाना, क्या आश्चर्यजनक है? आंखें बंद रखने के अतिरिक्त न कोई पाप है, न अपराध है। आंखें खोलते ही सब अंधकार विलीन हो जाता है।
एक साधु का स्मरण आता है। उसे बहुत यातनाएं दी गई, किंतु उसकी शांति को नहीं तोड़ा जा सका था। और, उसे बहुत कष्ट दिये गये थे, लेकिन उसकी आनंद मुद्रा नष्ट नहीं की जा सकी थी। यातनाओं के बीच भी वह प्रसन्न था और गालियों के उत्तर में उसकी वाणी मिठास से भरी थी। किसी ने उससे पूछा, ''आप में इतनी अलौकिक शक्ति कैसे आई?'' वह बोला, ''अलौकिक? कहां? इसमें तो कुछ भी अलौकिक नहीं है। बस, मैंने अपनी आंखों का उपयोग करना सीख लिया है।'' उसने कहा, ''मैं आंखें होते अंधा नहीं हूं।'' लेकिन , आंखों से शांति का और साधुता का और सहनशीलता का क्या संबंध? जिससे ये शब्द कहे गये थे, वह नहीं समझ सका था। उसे समझाने के लिये साधु ने पुन: कहा, ''मैं ऊपर आकाश की ओर देखता हूं, तो पाता हूं कि यह पृथ्वी का जीवन अत्यंत क्षणिक और स्वप्नवत् है। और, स्वप्न में किया हुआ व्यवहार मुझे कैसे छू सकता है? और अपने भीतर देखता हूं, तो उसे पाता हूं, जो कि अविनश्वर है- उसका तो कोई भी कुछ भी बिगाड़ने में समर्थ नहीं है! और, जब मैं अपने चारों ओर देखता हूं, तो पाता हूं कि कितने हृदय हैं, जो मुझ पर दया करते और प्रेम करते हैं, जबकि उनके प्रेम को पाने की पात्रता भी मुझ में नहीं। यह देख मन में अत्यंत आनंद और कृतज्ञता का बोध होता है। और, अपने पीछे देखता हूं, तो कितने ही प्राणियों को इतने दुख और पीड़ा में पाता हूं कि मेरा हृदय करुणा और प्रेम से भर आता है। इस भांति मैं शांत हूं और कृतज्ञ हूं, आनंदित हूं और प्रेम से भर गया हूं। मैंने आंखों का उपयोग सीख लिया है। मित्र, मैं अंधा नहीं हूं।''
और, अंधा न होना कितनी बड़ी शक्ति है? आंखों का उपयोग ही साधुता है। वही धर्म है। आंखें सत्य को देखने के लिये हैं। जागो- और देखो। जो आंखें होते हुए भी उन्हें बंद किये हैं, वह स्वयं अपना दुर्भाग्य बोता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

प्रात:कालीन ध्यान विधियां- मंडल



यह एक अन्य शक्तिशाली विधि है, जो ऊर्जा का एक वर्तुल निर्मित कर देती है। जिसके स्वाभाविक रूप से केंद्र में प्रवेश घट जाता है। इसमें पंद्रह-पंद्रह मिनट के चार चरण हैं।
प्रथम चरण : पंद्रह मिनट
आंखें खुली रखें और एक ही स्थान पर खड़े-खड़े दौड़ें। धीरे-धीरे शुरू करके तीव्र से तीव्र होते जाएं। जहां तक बन सकें घुटनों को ऊपर उठाएं। श्वास को गहरा और सम रखने से ऊर्जा भीतर घूमने लगेगी। मन को भूल जाएं और शरीर को भूल जाएं। बस एक ही जगह पर दौड़ते रहें।
दूसरा चरण : पंद्रह मिनट
आंखें बंद करके बैठ जाएं। मुंह को शिथिल और खुला रखें। कमर से ऊपर के शरीर को धीरे-धीरे चक्राकार घुमाएं- जैसे हवा में पेड़-पौधे झूमते हैं। अनुभव करें कि हवा आपको इधर-उधर, आगे-पीछे और चारों ओर घुमा रही है। इससे भीतर जागी ऊर्जा नाभि-केंद्र पर आ जाएगी।
तीसरा चरण : पंद्रह मिनट
अब आंखें खोल कर, सिर को स्थिर रखते हुए पीठ के बल लेट जाएं और दोनों आंखों की पुतलियों को बाएं से दाएं घड़ी के कांटे की तरह वृत्ताकार घुमाएं। आंखों को इस तरह घुमाएं, जैसे कि वे एक बड़ी सुई का अनुसरण कर रही हों, परंतु गति को जितना हो सके तेज रखें। यह महत्वपूर्ण है। मुंह खुला रहे और जबड़े शिथिल रहें। श्वास धीमी एवं सम बनी रहे। इससे आपकी केंद्रित ऊर्जा तीसरी आंख पर आ जाएगी।
चौथा चरण : पंद्रह मिनट
आंखें बंद करलें और शांत लेट रहें।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)
मृत्यु का भय
जब तक मृत्यु हो ही नहीं जाती तब तक हम उसे जान ही नहीं सकते। फिर हम उससे क्यों भयभीत हैं?
बुनियादी सत्य यह है कि हम नहीं हैं। और क्योंकि हम नहीं हैं, हम न मर सकते हैं और न जन्म ले सकते हैं। क्योंकि आप नहीं हैंे, आप दुख में और बंधन में नहीं हो सकते। ओशो हमें एक आंतरिक खोज पर ले जाते हैं: अगर आप खोजो तो पता चलेगा कि आपका शरीर एक संयोग है, जोड़ है। कुछ चीज मां से मिली है, कुछ चीज पिता से मिली है और शेष सब भोजन से मिला है। फिर मन पर ध्यान करें-- कुछ यहां से आया है, कुछ वहां से आया है। मन में कुछ भी ऐसा नहीं है जो मौलिक हो। वह भी एक संग्रह है।
अगर गहरे खोजते चले गए तो आपको पता चलेगा कि आपका व्यक्तित्व एक प्याज जैसा है। एक पर्त को हटाओ कि दूसरी पर्त सामने आ जाती है। दूसरी को हटाओ, तीसरी आ जाती है। पर्त पर पर्त हटाते जाओ और अंत में आपके हाथ में शून्य बचेगा।
एक बार अपने शून्य का साक्षात्कार कर लें तो फिर भय नहीं रहेगा।
अमृत साधना

जीवन को विधायक आरोहण दो!


जीवन से अंधकार हटाना व्यर्थ है, क्योंकि अंधकार हटाया नहीं जा सकता। जो जानते हैं, वे अंधकार को नहीं हटाते, वरन् प्रकाश को जलाते हैं।
एक प्राचीन लोक।कथा है- उस समय की, जबकि मनुष्य के पास प्रकाश नहीं था, अग्नि नहीं थी। रात्रि तब बहुत पीड़ा थी। लोगों ने अंधकार को दूर करने के बहुत उपाय सोचे, पर कोई भी कारगर नहीं हुआ। किसी ने कहा मंत्र पढ़ो, तो मंत्र पढ़े गये और किसी ने सुझाया कि प्रार्थना करो, तो कोरे आकाश की ओर हाथ उठाकर प्रार्थनाएं की गई। पर अंधकार न गया, सो न गया। किसी युवा चिंतक और आविष्कारक ने अंतत: कहा, ''हम अंधकार को टोकरियों में भर-भरकर गड्ढों में डाल दें। ऐसा करने से धीरे-धीरे अंधकार क्षीण होगा। और फिर उसका अंत भी आ सकता है।'' यह बात बहुत युक्तिपूर्ण मालूम हुई और लोग रात-रात भर अंधेरे को टोकरियों में भर-भरकर गड्ढों में डालते, पर जब देखते तो पाते कि वहां तो कुछ भी नहीं है! ऐसे-ऐसे लोग बहुत ऊब गये। लेकिन, अंधकार को फेंकने ने एक प्रथा का रूप ले लिया और हर व्यक्ति प्रति रात्रि कम से कम एक टोकरी अंधेरा तो जरूर ही फेंक आता था! फिर, एक युवक किसी अप्सरा के प्रेम में पड़ गया और उसका विवाह उस अप्सरा से हुआ। पहली ही रात बहू से घर के बढ़े सयानों ने अंधेरे की एक टोकरी घाटी में फेंक आने को कहा। वह अप्सरा यह सुन बहुत हंसने लगी। उसने किसी सफेद पदार्थ की बत्ती बनाई, एक मिट्टी के कटोरे में घी रखा और फिर किन्हीं दो पत्थरों को टकराया। लोग चकित देखते रहे- आग पैदा हो गई थी, दीया जल रहा था और अंधेरा दूर हो गया था! उस दिन से फिर लोगों ने अंधेरा फेंकना छोड़ दिया, क्योंकि वे दिया जलाना सीख गये थे। लेकिन जीवन के संबंध में हममें से अधिक अभी भी दीया जलाना नहीं जानते हैं। और, अंधकार से लड़ने में ही उस अवसर को गंवा देते हैं, जो कि अलौकिक प्रकाश में परिणित हो सकता है।
प्रभु को पाने की आकांक्षा से भरो, तो पाप अपने से छूट जाते हैं। और, पापों से ही लड़ते रहते हैं, वे उनमें ही और गहरे धंसते जाते हैं। जीवन को विधायक आरोहण दो, निषेधात्मक पलायन नहीं। सफलता का स्वर्ण सूत्र यही है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

संसार दर्पण है!


फूलों को सारा जगत फूल है और कांटों को कांटा। जो जैसा है, वैसा ही दूसरे उसे प्रतीत होते हैं। जो स्वयं में नहीं है, उसे दूसरों में देख पाना कैसे संभव है! सुंदर को खोजने, चाहे हम सारी भूमि पर भटक लें, पर यदि वह स्वयं के ही भीतर नहीं है, तो उसे कहीं भी पाना असंभव है।
एक अजनबी किसी गांव में पहुंचा। उसने उस गांव के प्रवेश द्वार पर बैठे एक वृद्ध से पूछा, ''क्या इस गांव के लोग अच्छे और मैत्रिपूर्ण हैं?'' उस वृद्ध ने सीधे उत्तर देने की बजाय स्वयं ही उस अजनबी से प्रश्न किया, ''मित्र, जहां से तुम आते हो वहां के लोग कैसे हैं?'' अजनबी दुखी और क्रुद्ध हो कर बोला, ''अत्यंत क्रूर, दुष्ट और अन्यायी। मेरी सारी विपदाओं के लिए उनके अतिरिक्त और कोई जिम्मेवार नहीं। लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं?'' वृद्ध थोड़ी देर चुप रहा और बोला, ''मित्र, मैं दुखी हूं। यहां के लोग भी वैसे ही हैं। तुम उन्हें भी वैसा ही पाओगे।''
वह व्यक्ति जा भी नहीं पाया था कि एक दूसरे राहगीर ने उस वृद्ध से आकर पुन: वही बात पूछी, ''यहां के लोग कैसे हैं?'' वह वृद्ध बोला, ''मित्र क्या पहले तुम बता सकोगे कि जहां से आते हो, वहां के लो कैसे हैं?'' इस प्रश्न को सुन यह व्यक्ति आनंदपूर्ण स्मृतियों से भर गया। और उसकी आंखें खुशी के आंसुओं से गीली हो गई। वह बोलने लगा, ''आह, बहुत प्रेमपूर्ण और बहुत दयालू, मेरी सारी खुशियों के कारण वे ही थे। काश, मुझे उन्हें कभी भी न छोड़ना पड़ता!'' वह वृद्ध बोला,''मित्र, यहां के लोग भी बहुत प्रेमपूर्ण हैं, इन्हें तुम उनसे कम दयालु नहीं पाओगे, ये भी उन जैसे ही हैं। मनुष्य-मनुष्य में बहुत भेद नहीं है।''
संसार दर्पण है। हम दूसरों में जो देखते हैं, वह अपनी ही प्रतिक्रिया होती है। जब तक सभी में शिव और सुंदर के दर्शन न होने लगें, तब तक जानना चाहिए कि स्वयं में ही कोई खोट शेष रह गई है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

अंध-जीवेषणा


मैंने सुना है कि क्राइस्ट ने लोगों को कब्रों से उठाया और उन्हें जीवन दिया। जो स्वयं को शरीर जानता हे, वह कब्र में ही है। शरीर के ऊपर आत्मा को जानकर ही कोई कब्र से उठता और जीवित होता है।
मिश्र के किसी प्राचीन आश्रम में किसी साधु की मृत्यु हो गई थी। उसे भूमि-गर्भ में निर्मित विशाल मुर्दाघर में उतार दिया गया। लेकिन सौभाग्य या दुर्भाग्य से वह मरा नहीं और कुछ समय बाद मृतकों की उस बस्ती में होश में आ गया। उसकी मानसिक पीड़ा और संताप की कल्पना करना भी कठिन है। उस दुर्गध और मृत्यु से भरी अंधेरी बस्ती में, जहां सैकड़ों मुरदे सड़ रहे थे, वह जीवित था! बाहर पहुंचने का कोई मार्ग नहीं, आवाज बाहर पहुंच सके, इस तक की कोई संभावना नहीं। उसने क्या किया होगा? क्या वह भूखा और प्यासा मर गया? क्या उसने उस मृत-जीवन का मोह छोड़कर स्वयं को बचाने की कोई कोशिश नहीं की? नहीं, मित्र, जीवन-आसक्ति बहुत गहरी और घनी है। वह साधु वहीं जीने लगा। कीड़े-मकोड़े उसका भोजन बन गये। मृत्यु-गृह की दीवारों से रिसता गंदा पानी वह पी लेता और कीड़ों पर निर्वाह करता। मुरदों के कपड़े निकाल कर उसने अपने सोने और पहनने की व्यवस्था कर ली थी। और, वह निरंतर अपने किसी साथी की मृत्यु के लिये प्रार्थना करता रहता। क्योंकि, किसी के मरने पर ही उस अंध-गृह के द्वार खुल सकते थे। वर्ष पर वर्ष बीते उसे तो समय की भी पता नहीं पड़ता था। फिर एक दिन कोई मरा, तो द्वार खुले और लोगों ने उसे जीवित पाया। उसकी दाढ़ी सफेद हो गयी थी और जमीन को छूती थी। और, जब लोग उसे बाहर निकाल रहे थे, तब वह मुरदों से उतारे गये कपड़े और उनके कपड़ों में से इकट्ठे किये गये रुपये-पैसे साथ ले लेना नहीं भूला था!
यह अतीत में घटी कोई घटना है या कि स्वयं हमारे जीवन का प्रतिबिंब? क्या यह घटना हम सबके जीवन में अभी और यहीं नहीं घट रही है? मैं देखता हूं, तो पाता हूं कि हममें से प्रत्येक एक दूसरे की मृत्यु के लिए प्रार्थना कर रहा है। और, हम सब मुरदों की बस्ती में हैं, जहां से बाहर निकलने के लिए कोई द्वार नहीं मालूम होता है। और, हम भी दूसरे मुरदों के कपड़े और पैसे छीन रहे हैं। और हमारा निर्वाह भी कीड़े-मकोड़ों पर ही है। और, यह सब हो रहा है, अंधी जीवन-आसक्ति-जीवेषणा के कारण।
अंध-जीवेषणा से परिचालित व्यक्ति वास्तविक जीवन को अनुभव नहीं कर पाता। उसकी धुंध से जो मुक्त होता है, वही जीवन को जानता है। उससे प्रभावित चेतना कब्र में ही है, ऐसा ही जानना।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

सत्य की एक झलक


सत्य की एक किरण भी बहुत है। ग्रंथों का भार जो नहीं करता है, सत्य की एक झलक भी वह कर दिखाती है। अंधेरे में उजाला करने को प्रकाश के ऊपर बड़े-बड़े शास्त्र किसी काम के नहीं, एक मिट्टी का दीया जलाना आना ही पर्याप्त है।
राल्फ वाल्डे इमर्सन के व्याख्यानों में एक बूढ़ी धोबिन निरंतर देखी जाती थी। लोगों को हैरानी हुई : एक अपढ़ गरीब औरत इमर्सन की गंभीर वार्ताओं को क्या समझती होगी! किसी ने आखिर उससे पूछ ही लिया कि उसकी समझ में क्या आता है? उस बूढ़ी धोबिन ने जो उत्तर दिया, वह अद्भुत था। उसने कहा, ''मैं जो नहीं समझती, उसे तो क्या बताऊं। लेकिन, एक बात मैं खूब समझ गई हूं और पता नहीं कि दूसरे उसे समझे हैं या नहीं। मैं तो अपढ़ हूं और मेरे लिए एक ही बात काफी है। उस बात ने मेरा सारा जीवन बदल दिया है। और वह बात क्या है? वह है कि मैं भी प्रभु से दूर नहीं हूं, एक दरिद्र अज्ञानी स्त्री से भी प्रभु दूर नहीं है। प्रभु निकट है- निकट ही नहीं, स्वयं में है। यह छोटा सा सत्य मेरी दृष्टि में आ गया है और अब मैं नहीं समझती कि इससे भी बड़ा कोई और सत्य हो सकता है!''
जीवन बहुत तथ्य जानने से नहीं, किंतु सत्य की एक छोटी -सी अनुभूति से ही परिवर्तित हो जाता है। और, जो बहुत जानने में लग रहते हैं, वे अक्सर सत्य की उस छोटी-सी चिंगारी से वंचित ही रह जाते हें, जो कि परिवर्तन लाती है और जीवन में बोध के नये आयाम जिससे उद्घटित होते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

स्वयं से पूछो : ''मैं कौन हूं?''


''मैं कौन हूं?'' जो स्वयं से इस प्रश्न को नहीं पूछता है, ज्ञान के द्वार उसके लिए बंद ही रह जाते हैं। उस द्वार को खोलने की कुंजी यही है। स्वयं से पूछो कि ''मैं कौन हूं?'' और, जो प्रबलता से और समग्रता से पूछता है, वह स्वयं से ही उत्तर भी पा जाता है।
कारलाइल बूढ़ा हो गया था। उसका शरीर अस्सी वसंत देख चुका था। और जो देह कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, वह अब जर्जर और ढीली हो गई थी : जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे। ऐसे बुढ़ापे की एक सुबह की घटना है। कारलाइल स्नानगृह में था। स्नान के बाद वह जैसे ही शरीर को पोंछने लगा, उसने अचानक देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे कि वह अपनी मान बैठा था! शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है। वह काया अब कहां है, जिसे उसने प्रेम किया था? जिस पर उसने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो शेष रह गया है? पर, साथ ही एक अत्यंत अभिनव-बोध भी उसके भीतर अकुंडलित होने लगा : ''शरीर तो वही नहीं है, लेकिन वह तो वही है। वह तो नहीं बदला है।'' और तब उसने स्वयं से ही पूछा था : ''आह! तब फिर मैं कौन हूं?'' यही प्रश्न प्रत्येक को अपने से पूछना होता है। यही असली प्रश्न है। प्रश्नों का प्रश्न यही है। जो इसे नहीं पूछते, वे कुछ भी नहीं पूछते हैं। और, जो पूछते ही नहीं, वे उत्तर कैसे पा सकगें?
पूछो- अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूंजने दो : ''मैं कौन हूं?'' जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है। और, वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है। उसके पूर्व मनुष्य अंधा है। उसके बाद ही वह आंखों को पाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

यांत्रिक प्रवाह से मुक्ति!


मंदिर और उपासना-गृहों में बैठने का कोई मूल्य नहीं है और तुम्हारे हाथों में ली गई मालाएं झूठी हैं, जब तक कि विचार के यांत्रिक प्रवाह से तुम मुक्त नहीं होते हो। जो विचारों की तरंगों से मुक्त हो जाता है, वह जहां भी है, वहीं मंदिर में है और उसके हाथ में जो भी कार्य है, वही माला है।
एक व्यक्ति ने किसी साधु से कहा था, ''मेरी पत्नी मेरी धर्म-साधना में श्रद्धा नहीं रखती है। आप उसे थोड़ा समझा दें तो अच्छा है।'' दूसरे दिन सुबह ही वह साधु उसके घर गया। घर के बाहर बगिया में ही उसकी पत्नी मिल गई। साधु ने पति के संबंध में पूछा। पत्नी ने कहा, ''जहां तक मैं समझती हूं, इस समय वह किसी चमार की दुकान पर झगड़ा कर रहे हैं।'' सुबह का धुंधलका था। पति पास ही बनाए गए अपने उपासना-गृह में माला फेर रहा था। उससे इस झूठ को नहीं सहा गया। वह बाहर आकर बोला, ''यह बिलकुल असत्य है। मैं अपने मंदिर में था।'' साधु भी हैरान हुआ; पर पत्नी बोली, ''क्या सच ही तुम उपासना-गृह में थे? क्या माला हाथ में, शरीर मंदिर में और मन कहीं और नहीं था?'' पति को होश आया। सच ही वह माला फेरते-फेरते चमार की दुकान में चला गया था। उसे जूते खरीदने थे और रात्रि ही उसने अपनी पत्नी से कहा था कि सुबह होते ही उन्हें खरीदने चला जाऊंगा। फिर विचार में ही चमार से मोल-तोल पर उसका कुछ झगड़ा हो रहा था!
विचार को छोड़ो और निर्विचार हो रहो, तो तुम जहां हो प्रभु का आगमन वहीं हो जाता है। उस खोजने तुम कहां जाओगे? और, जिसे जानते ही नहीं उसे खोजोगे कैसे? उसकी खोज से नहीं, स्वयं के भीतर शांति के निर्माण से ही उसे पाया जाता है। कोई आज तक उसके पास नहीं गया है, वरन् जो अपनी पात्रता से उसे आमंत्रित करता है, उसके पास वह स्वयं ही चला आता है। मंदिर में जाना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे स्वयं ही मंदिर बन जाते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

प्रात:कालीन ध्यान विधियां- सक्रिय ध्यान

प्रथम चरण : दस मिनट
नाक से तेजी से श्वास भीतर लें और बाहर छोड़ें। श्वास भीतर लेने और बाहर छोड़ने- दोनों पर जोर लगाएं और उन्हें अराजक बना रहने दें। श्वास फेफड़ों में गहराई से जाए। श्वास लेने और छोड़ने में तेजी लाएं, लेकिन निश्चित रहे कि श्वास गहरी बनी रहे। इसे यथाशक्ति अपनी अधिकतम समग्रता से करें- बिना अपने शरीर को तनाव पूर्ण बनाए। और, पक्का कर लें कि कंधे और गर्दन शिथिल अवस्था में हैं। श्वास जारी रखें जब तक कि आप श्वास ही श्वास न हो जाएं; श्वास को अराजक और अस्तव्यस्त बना रहने दें। अर्थात श्वास न लयबद्ध और न ही किसी पूर्वनिर्धारित नियम पर आधारित हो। एक बार ऊर्जा जग जाए, फिर शरीर को भी गति देने लगेगी। इन शारीरिक गतियों को होने दें; इन्हें और अधिक ऊर्जा निर्मित होने में सहायक होने दें। अपने हाथों और शरीर को सहज रूप से गति करने दें, ताकि वे ऊर्जा के उठने में सहयोगी बन सकें। ऊर्जा को उठता हुआ अनुभव करें। पहले चरण में अपने को जरा भी ढीला मत छोड़े और श्वास को जरा भी धीमा मत होने दें।
दूसरा चरण : दस मिनट
अपने शरीर को पूरी तरह छोड़ दें। अपने शरीर को स्वतंत्रता दें कि वह जो कुछ करना चाहे, कर सके ..विस्फोट हो जाने दें ..अपने शरीर को आविष्ट हो जाने दें। जो कुछ भी भीतर से बाहर आए, उसे रोकें नहीं। पूरी तरह से पागल हो जाएं ..गाएं, चीखें, हंसे, चिल्लाएं, रोएं, कूदें, कांपें, नाचें, हाथ-पैर चलाएं और शरीर को सब दिशाओं में गति करने दें। शुरू में थोड़ा सा अभिनय प्रक्रियाओं को गति देने में सहायक होता है। जो भी हो रहा है, उसमें अपने मन को दखल न डालने दें। स्मरण रखें कि आप आने शरीर के साथ समग्रता से सहयोग कर रहे हैं।
तीसरा चरण : दस मिनट
कंधे और गर्दन को ढीला रखते हुए अपने दोनों हाथ पूरी तरह से ऊपर उठाएं, कोहनियां शिथिल रहें, दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए हू! ..हू! ..हू! मंत्र का जोरों से उच्चार करते हुए ऊपर उछलें, नीचे आएं। 'हू' का उच्चार अधिकतम गहरा हो और वह आपकी नाभि से उठे। हर बार जब आप नीचे आएं तब पैर के तलवे और एड़ी को धीमे से जमीन को छूने दें और उसी समय 'हू' की तीव्र ध्वनि से काम-केंद्र पर गहराई से चोट करें। इस चरण में अपनी पूरी शक्ति लगाएं; थोड़ी भी शक्ति शेष न बचाएं।
चौथा चरण : पंद्रह मिनट
रुक जाएं। जहां भी हैं, जैसे भी हैं, बिलकुल जम जाएं। शरीर को जरा भी व्यवस्थित न करें। जरा सी खांसी, कोई भी गति, कोई भी हलन-चलन ऊर्जा को क्षीण करेगी और अब तक की मेहनत को खराब करेगी। जो भी हो रहा है, उसके साक्षी बने रहें।
पांचवां चरण : पंद्रह मिनट
उत्सव मनाएं। संगीत और नृत्य के साथ अपने अंतस के अहोभाव को अभिव्यक्त करें। फलित हुई जीवंतता को दिन भर की अपनी चर्या में फैलने दें।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ऊर्जा का वर्तुल : अमृत साधना
यह एक वैज्ञानिक ओशो ध्यान विधि है -- जब आप आईने के सामने खड़े होंे, पहले अपने प्रतिबिंब को देखें ः आप देख रहे हैं और प्रतिबिंब दिख रहा है। फिर इस प्रक्रिया को उलटा देंे। ऐसा महसूस करें कि आप प्रतिबिंब हैं और प्रतिबिंब आपको देख रहा है। तत्क्षण आप देखेंेगे कि बदलाव हो रहा है, सघन ऊर्जा आपकी तरफ आ रही है।
यदि थोड़े दिन आप इसे करते हैं तो चकित होओगे कि सारे दिन कितना जीवंत महसूस करने लगे हैं। जहां कहीं वर्तुल पूरा होता है वहीं गहन मौन होता है। अधूरा वर्तुल बैचेनी पैदा करता है। जब वर्तुल पूरा हो जाता तो यह विश्राम पैदा करता है, यह आपको केंद्रित करता है। और केंद्रित होना ऊर्जावान बनाता है--और वह ऊर्जा आपकी ही है। यह तो मात्र एक प्रयोग है; फिर आप कई आयामों से प्रयास कर सकते हैंे।
जब आप गुलाब के फूल को देखेंगे, पहले कुछ पल गुलाब को देखें, और तब उल्टी प्रक्रिया प्रारंभ करें ः गुलाब का फूल आपको देख रहा है। आप आश्चर्यचकित होओगे कि गुलाब का फूल कितनी ऊर्जा आपको दे सकता है। और यही वृक्षों के साथ, और तारों के साथ और लोगों के साथ किया जा सकता है।

जन्म-मृत्यु से परे है जीवन!


मैं एक शवयात्रा में गया था। जो वहां थे, उनसे मैंने कहा- यदि यह शवयात्रा तुम्हें अपनी ही मालूम नहीं होती है, तो तुम अंधे हो। मैं तो स्वयं को अर्थी पर बंधा देख रहा हूं। काश! तुम भी ऐसा ही देख सको, तो तुम्हारा जीवन दूसरा हो जावे। जो स्वयं की मृत्यु को जान लेता है, उसकी दृष्टिं संसार से हटकर सत्य पर केंद्रित हो जाती है।
शेखसादी ने लिखा है- बहुत दिन बीते दजला के किनारे एक मुरदे की खोपड़ी ने कुछ बातें एक राहगीर से कही थीं। वह बोली थी,'ओ! प्यारे, जरा होश में चल। मैं भी कभी शाही दबदबा रखती थी और मेरे ऊपर ताज था। फतह मेरे पीछे-पीछे चली और मेरे पैर जमीन पर न पड़ते थे। होश ही न था कि एक दिन सब समाप्त हो गया। कीड़े मुझे खा गए हैं और हर पैर मुझे ठोकर मार जाता है। तू भी अपने कानों से गफलत की रुई निकाल डाल, ताकि तुझे मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत हासिल हो सके।'
मुरदों की आवाज से उठने वाली नसीहत क्या है? और, क्या कभी हम उसे सुनते हैं! जो उसे सुन लेता है, उसका जीवन ही बदल जाता है।
जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी है। उन दोनों के बीच जो है, वह जीवन नहीं, जीवन का आभास ही है। जीवन वह कैसे होगा, क्योंकि जीवन की मृत्यु नहीं हो सकती है! जन्म का अंत है, जीवन का नहीं। और, मृत्यु का प्रारंभ है, जीवन का नहीं। जीवन तो उन दोनों से पार है। जो उसे नहीं जानते हैं, वे जीवित होकर भी जीवित नहीं हैं। और, जो उसे जान लेते हैं, वे मर कर भी नहीं मरते।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या?


सुबह आती है, तो मैं सुबह को स्वीकार कर लेता हूं और सांझ आती है, तो सांझ को स्वीकार कर लेता हूं। प्रकाश का भी आनंद है और अंधकार का भी। जब से यह जाना, तब से दुख नहीं जाना है।
किसी आश्रम से एक साधु बाहर गया था। लौटा तो उसे ज्ञात हुआ कि उसका एकमात्र पुत्र मर गया है और उसकी शवयात्रा अभी राह में ही होगी। वह दुख में पागल हो गया। उसे खबर क्यों नहीं की गई? वह आवेश में अंधा दौड़ा हुआ श्मशान की और चला गया। शव मार्ग में ही था। उसके गुरु शव के पास ही चल रहे थे। उसने दौड़कर उन्हें पकड़ लिया। दुख में वह मू‌िर्च्छत-सा हो गया था। फिर अपने गुरु से उसने प्रार्थना की, ''दो शब्द सांत्वना के कहें। मैं पागल हुआ जा रहा हूं।'' गुरु ने कहा, ''शब्द क्यों, सत्य ही जानो। उससे बड़ी कोई सांत्वना नहीं।'' और, उन्होंने शव-पेटिका के ढक्कन को खोला और उससे कहा, ''देखो- 'जो है', उसे देखो।'' उसने देखा। उसके आंसू थम गए। सामने मृत देह थी। वह देखता रहा और एक अंतदर्ृष्टिं का उसके भीतर जन्म हो गया। जो है- है, उसमें रोना-हंसना क्या? जीवन एक सत्य है, तो मृत्यु भी एक सत्य है। जो है- है। उससे अन्यथा चाहने से ही दुख पैदा होता है।
एक समय मैं बहुत बीमार था। चिकित्सक भयभीत थे और प्रियजनों की आंखों में विषाद छा गया था। और, मुझे बहुत हंसी आ रही थी, मैं मृत्यु को जानने को उत्सुक था। मृत्यु तो नहीं आई, लेकिन एक सत्य अनुभव में आ गया। जिसे भी हम
स्वीकार कर लें, वही हमें पीड़ा पहुंचाने में असमर्थ हो जाता
है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाडंडेशन)

हम सोये ही हुए हैं!


स्‍‌मरण रहे कि मैं मूर्छा को ही पाप कहता हूं। अमूर्च्छित चित्त-दशा में पाप वैसे ही असंभव है, जैसे कि जानते और जागते हुए अग्‍ि‌न में हाथ डालना। जो अमूच्‍‌र्छा को साध लेता है, वह सहज ही धर्म को उपलब्‍‌ध हो जाता है।
संत भीखण के जीवन की घटना है। वे एक रात्रि प्रवचन करते थे। आसोजी नाम का एक श्रावक सामने बैठा नींद ले रहा था। भीखण ने उससे पूछा- ‘‘आसोजी! नींद लेते हो?’’ आसोजी ने आंखें खोलीं और कहा- ‘‘नहीं महाराज!’’ थोड़ी देर और नींद फिर वापस लौट आई। भीखणजी ने फिर पूछा- ‘‘आासोजी सोते हो?’’ फिर मिला वही उत्तर- ‘‘नहीं महाराज।‘’ नींद में डूबा आदमी सच कब बोलता है! और, बोलना भी चाहे तो बोल कैसे सकता है! नींद फिर से आ गई। इस बार भीखण ने जो पूछा वह अद्भुत था। बहुत उसमें अर्थ है। प्रत्‍‌येक को स्‍‌वयं से पूछने योग्‍‌य वह प्रश्‍‌न है। वह अकेला प्रश्‍‌न ही बस, सारे तत्‍‌व-चिंतन का केंद्र और मूल है। उन्‍‌होंने जोर से पूछा- ‘‘आसोजी! जीते हो?’’ आसोजी तो सोते थे। निद्रा में सोचा कि वही पुराना प्रश्‍‌न है। फिर नींद में ‘‘जीते हो’’, ‘‘ सोते हो’’ जैसा ही सुनाई दिया होगा! आंखें तिलमिलाई और बोले- ‘‘नहीं महाराज!’’ भूल से सही उत्तर निकल गया। निद्र में जो है, वह मृत ही के तुल्‍‌य है। प्रमादपूर्ण जीवन और मृत्‍‌यु में अंतर ही क्‍‌या हो सकता है? जाग्रत ही जीवित है। जब तक हम जागते नहीं हैं- विवेक और प्रज्ञा में, तब तक हम जीवित भी नहीं हैं।
जो जीवन को पाना चाहता है, उसे अपनी निद्रा और मूच्‍‌र्छा छोड़नी होगी। साधारणत: हम सोये ही हुए हैं। और, हमारे भाव, विचार और कर्म सभी मूच्‍ि‌र्छत हैं। हम उन्‍‌हें ऐसे कर रहे हैं, जैसे कि कोई और हमसे कराता हो और जैसे कि हम किसी गहरे सम्‍‌मोहन में उन्‍‌हें कर रहे हों। जागने का अर्थ है कि मन और काया से कुछ भी मूच्‍ि‌र्छत न हो- जो भी हो, वह पूरी जागरूकता और सजगता में हो। ऐसा होने पर अशुभ असंभव हो जाता है और शुभ सहज ही फलित होता है।
‘’(सौजन्‍‌य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ईश्वर अनुभूति है!


ईश्वर को जो किसी विषय या वस्तु की भांति खोजते हैं, वो ना-समझ हैं। वह वस्तु नहीं है। वह तो आलोक, आनंद और आत्मा की चरम अनुभूति का नाम है। वह व्यक्ति भी नहीं है कि उसे कहीं बाहर पाया जा सके। वह तो स्वयं की चेतना का ही आत्यांतिक परिष्कार है।।

एक फकीर से किसी ने पूछा, ''ईश्वर है, तो दिखाई क्यों नहीं देता?'' उस फकीर ने कहा, ''ईश्वर कोई वस्तु नहीं है, वह तो अनुभूति है। उसे देखने का कोई उपाय नहीं, हां, अनुभव करने का अवश्य है।'' किंतु, वह जिज्ञासु संतुष्ट नहीं दिखाई दिया। उसकी आंखों में प्रश्न वैसा का वैसा ही खड़ा था। तब फकीर ने पास में ही पड़ा एक बड़ा पत्थर उठाया और अपने पैर पर पटक लिया। उसके पैर को गहरी चोट पहुंची और उससे रक्त-धार बहने लगी। वह व्यक्ति बोला, ''यह आपने क्या किया? इससे तो बहुत पीड़ा होगी? यह कैसा पागलपन?'' वह फकीर हंसने लगा और बोला, ''पीड़ा दीखती नहीं, फिर भी है। प्रेम दीखता नहीं, फिर भी होता है। ऐसा ही ईश्वर भी है।''

जीवन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं- उसकी भी सत्ता है, जो कि दिखाई नहीं पड़ता है। और, दृश्य से अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है, क्योंकि उसे अनुभव करने को स्वयं के प्राणों की गहराई में उतरना आवश्यक होता है। तभी वह ग्रहणशीलता उपलब्ध होती है, जो कि उसे स्पर्श और प्रत्यक्ष कर सके। साधारण आंखें नहीं, उसे जानने को तो अनुभूति की गहरी संवेदनशीलता पानी होती है। तभी उसका आविष्कार होता है। और, तभी ज्ञात होता है कि वह बाहर नहीं है कि उसे देखा जा सकता, वह तो भीतर है, वह तो देखने वाले में ही छिपा है।

ईश्वर को खोजना नहीं, खोदना होता है। स्वयं में ही जो खोदते चले जाते हैं, वे अंतत: उसे अपनी सत्ता के मूल-स्रोत और चरम विकास की भांति अनुभव करते हैं।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रात:कालीन ध्यान विधियां

एक-सूर्योदय की प्रतीक्षा में
सूर्योदय से बस पंद्रह मिनट पहले
, जब आकाश में हलका सा प्रकाश फैलने लगे, तब सिर्फ देखें और प्रतीक्षा करें। जैसे कि कोई अपने प्रियतम की प्रतीक्षा करता है- व्यग्रता से, गहरी प्रतीक्षा में, आशा से भरे हुए और उत्तेजित- लेकिन फिर भी शांत। और, बस सूरज को उगने दें और देखते रहें। अपलक देखने की कोई जरूरत नहीं, आप अपनी पलकें झपका सकते हैं। बस सूर को उगते देखते रहें ओर ऐसा भाव करें कि साथ ही कोई चीज भीतर भी उग रही है। जब सूरज क्षितिज पर आए, तब भाव करें कि वह प्रकाश-बिंदु नाभि के पास ही है। वहां सूरज क्षितिज पर ऊपर आ रहा है और यहां, नाभि के भीतर, वह ऊपर आ रहा है, ीरे-धीरे ऊपर आ रहा है। वहां सूर्योदय हो रहा है और यहां प्रकाश का एक अंतर्बिदु उदय हो रहा है। बस दस मिनट काफी है। फिर अपनी आंखें बंद कर लें। जब पहले आप सूरज को खुल आंखों से देखते हैं, तो उसका एक प्रतिचित्र, 'निगेटिव' बनता है, इसलिए जब आप अपनी आंखें बंद कर लेते हैं, तो आप सूरज को भीतर जगमगाते हुए देख सकते हैं। और यह आपको बहुत ही आश्चर्यजनक रूप से बद देगा।

दो- उगते सूरज की प्रशंसा में

सूर्योदय से पहले पांच बजे उठ जाएं और आधे घंटे तक बस गाएं, गुनगुनाएं, आहें भरें, कराहें। इन आवाजों का कोई अर्थ होना जरूरी नहीं है- ये अस्ति्वगत होनी चाहिए, अर्थपूर्ण नहीं। इनका आनंद लें, इतना काफी है- यही इनका अर्थ है। आनंद से झूमें। इसे उगते सूरज की स्तुति बनने दें और तभी रुकें जब सूरज उदय हो जाए।

इससे दिन भर भीतर एक लय बनी रहंगी। सुबह से ही आप एक लयबद्धता अनुभव करेंगे और आप देखेंगे कि पूरे दिन का गुणधर्म ही बदल गया है- आप ज्यादा प्रेमपूर्ण, ज्यादा करुणापूर्ण, ज्यादा जिम्मेवार, ज्यादा मैत्रीपूर्ण हो गए हैं; और आप अब कम हिंसक, कम क्रोधी, कम महत्वाकांक्षी, कम अहंकारी हो गए हैं।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)


ध्‍यान से पहले- अमृत साधना

इससे पहले कि व्यक्ति ध्यान करे, उसे सीखना चाहिए अपनी देह के साथ कैसे प्रेम किया जाता है, कैसे उसकी परवाह की जाती है। अब तक आध्यात्मिकता का मतलब यही था कि देह तो दुश्मन है। यह सीख रगों में गहरे घुस कर बैठ गई है।

ओशो ने देह की ओर रुख मोड दिया। वे कहते हैं कि अवचेतन में कहीं गहरे बैठ चुके इस सबक ने लगभग सभी को देह के खिलाफ कर दिया है। देह को प्रेम करने के विचार तक से हमें शर्मिंदगी होती है, अजीब लगता है। लेकिन, अगर आप देह से प्रेम करना शुरू करें तो उससे इतना मजा आएगा, इतना सुख मिलेगा कि हो सकता है कि अस्तित्व के नये आयाम खुल जाएं।

अपने सुख को दूसरे पर निर्भर मत रहने दें। पेड़ के नीचे खाली बैठे हैं तो भी प्रसन्न रहेंे। यह जरा कठिन लगता है कि उस समय भी प्रसन्न कैसे रहा जाए जब प्रसन्न होने का कोई कारण न हो। आम तौर से हम किसी कारण से ही प्रसन्न होते हैं। जब कोई दोस्त आता है तो प्रसन्न हो जाते हैं। लेकिन बिना किसी कारण के होनेवाली प्रसन्नता में मस्ती होती है। प्रसन्नता का कोई दृश्य कारण नहीं होता, यह तो अपने भीतर से फूटने वाला झरना है।

ईश्वर अनुभूति है!



ईश्वर को जो किसी विषय या वस्तु की भांति खोजते हैं, वो ना-समझ हैं। वह वस्तु नहीं है। वह तो आलोक, आनंद और आत्मा की चरम अनुभूति का नाम है। वह व्यक्ति भी नहीं है कि उसे कहीं बाहर पाया जा सके। वह तो स्वयं की चेतना का ही आत्यांतिक परिष्कार है।।
एक फकीर से किसी ने पूछा, ''ईश्वर है, तो दिखाई क्यों नहीं देता?'' उस फकीर ने कहा, ''ईश्वर कोई वस्तु नहीं है, वह तो अनुभूति है। उसे देखने का कोई उपाय नहीं, हां, अनुभव करने का अवश्य है।'' किंतु, वह जिज्ञासु संतुष्ट नहीं दिखाई दिया। उसकी आंखों में प्रश्न वैसा का वैसा ही खड़ा था। तब फकीर ने पास में ही पड़ा एक बड़ा पत्थर उठाया और अपने पैर पर पटक लिया। उसके पैर को गहरी चोट पहुंची और उससे रक्त-धार बहने लगी। वह व्यक्ति बोला, ''यह आपने क्या किया? इससे तो बहुत पीड़ा होगी? यह कैसा पागलपन?'' वह फकीर हंसने लगा और बोला, ''पीड़ा दीखती नहीं, फिर भी है। प्रेम दीखता नहीं, फिर भी होता है। ऐसा ही ईश्वर भी है।''
जीवन में जो दिखाई पड़ता है, उसकी ही नहीं- उसकी भी सत्ता है, जो कि दिखाई नहीं पड़ता है। और, दृश्य से अदृश्य की सत्ता बहुत गहरी है, क्योंकि उसे अनुभव करने को स्वयं के प्राणों की गहराई में उतरना आवश्यक होता है। तभी वह ग्रहणशीलता उपलब्ध होती है, जो कि उसे स्पर्श और प्रत्यक्ष कर सके। साधारण आंखें नहीं, उसे जानने को तो अनुभूति की गहरी संवेदनशीलता पानी होती है। तभी उसका आविष्कार होता है। और, तभी ज्ञात होता है कि वह बाहर नहीं है कि उसे देखा जा सकता, वह तो भीतर है, वह तो देखने वाले में ही छिपा है।
ईश्वर को खोजना नहीं, खोदना होता है। स्वयं में ही जो खोदते चले जाते हैं, वे अंतत: उसे अपनी सत्ता के मूल-स्रोत और चरम विकास की भांति अनुभव करते हैं।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

स्व का बोध


स्वयं के भीतर जो है, उसे जानने से ही जीवन मिलता है। जो उसे नहीं जानता, वह प्रतिक्षण मृत्यु से और मृत्यु के भय से घिरा रहता है।

एक साधु को उसके मित्रों ने पूछा, ''यदि दुष्टजन आप पर हमला कर दें, तो आप क्या करेंगे?'' वह बोला, ''मैं अपने मजूत किले में जाकर बैठा रहूंगा।'' यह बात उसके शत्रुओं के कान तक पहुंच गई। फिर, एक दिन शत्रुओं ने उसे एकांत में घेर लिया और कहा, ''महानुभाव! वह मजबूत किला कहां है?'' वह साधु खूब हंसने लगा और फिर अपने हृदय पर हाथ रखकर बोला, ''यह है मेरा किला। उसके ऊपर कभी कोई हमला नहीं कर सकता है। शरीर तो नष्ट किया जा सकता है- पर जो उसके भीतर है- वह नहीं। वही मेरा किला है। मेरा उसके मार्ग को जानना ही मेरी सुरक्षा है।''

जो व्यक्ति इस मजबूत किले को नहीं जानता है, उसका पूरा जीवन असुरक्षित है। और, जो इस किले को नहीं जानता है, उसका जीवन प्रतिक्षण शत्रुओं से घिरा है। ऐसे व्यक्ति को अभी शांति और सुरक्षा के लिए कोई शरणस्थल नहीं मिला है। और, जो उस स्थल को बाहर खोजते हैं, वे व्यर्थ ही खोजते हैं, क्योंकि वह तो भीतर है।

जीवन का वास्तविक परिचय स्वयं में प्रतिष्ठित होकर ही मिलता है, क्योंकि उस बिंदु के बाहर जो परिधि है, वह मृत्यु से निर्मित है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

श्रेष्ठता आपके हाथ में!



मनुष्य के पैर नरक को और उसका सिर स्वर्ग को छूता है। ये दोनों ही उसकी संभावनाएं हैं। इन दोनों में से कौन-सा बीज वास्तविक बनेगा, यह उस पर, केवल उस पर निर्भर करता है।

मनुष्य की श्रेष्ठता स्वयं उसके हाथों में है। प्रकृति ने तो उसे मात्र संभावनाएं दी हैं। उसका रूप निर्र्णीत नहीं है। वह स्वयं का स्वयं ही सृजन करता है। यह स्वतंत्रता महिमापूर्ण है। किंतु, हम चाहें तो इसे ही दुर्भाग्य भी बना सकते हैं। और, अधिक लोगों को यह स्वतंत्रता दुर्भाग्य ही सिद्ध होती है। क्योंकि, सृजन की क्षमता में विनाश की क्षमता और स्वतंत्रता भी तो छिपी है! अधिकतर लोग दूसरे विकल्प का ही प्रयोग करते हें। क्योंकि, निर्माण से विनाश आसान होता है। और, स्वयं को मिटाने से आसान और क्या है? स्व-विनाश के लिए आत्मसृजन में न लगना ही काफी है। उसके लिए अलग से और कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। जो जीवन में ऊपर की ओर नहीं उठ रहा है, वह अनजाने और अनचाहे ही पीछे और नीचे गिरता जाता है।

मैंने सुना है कि किसी सभा में चर्चा चली थी कि मनुष्य सब प्राणियों में श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सब प्राणियों को वश में कर लेता है। किंतु, कुछ का विचार था कि मनुष्य तो कुत्ते से भी नीचा है, क्योंकि कुत्तों का संयम मनुष्य से कई गुना श्रेष्ठ होता है। इस विवाद में हुसैन उपस्थित थे। दोनों पक्ष वालों ने उनसे निर्णायक मत देने को कहा। हुसैन ने कहा था, ''मैं अपनी बात कहता हूं। उसी से निर्णय कर लेना। जब तक मैं अपना चित्त और जीवन पवित्र कामों में लगाये रहता हूं, तब तक देवताओं के करीब होता हूं। किंतु, जब मेरा चित्त और जीवन पापमय होता है, तो कुत्ते भी मुझ जैसे हजार हुसैनों से श्रेष्ठ होते हैं।''

मनुष्य मृण्मय और चिन्मय का जोड़ है। जो देह का और, उसकी वासनाओं का अनुसरण करता है, वह नीचे से नीचे उतरता जाता है। और, जो चिन्मय के अनुसंधान में रत होता है, वह अंतत: सच्चिदानंद को पाता है और स्वयं भी वही हो जाता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

प्रत्येक घटना कुछ न कुछ सिखाती है!

आंखें खुली हों, तो पूरा जीवन ही विद्यालय है। और, जिसे सीखने की भूख है, वह प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक घटना से सीख लेता है। और, स्मरण रहे कि जो इस भांति नहीं सीखता है, वह जीवन में कुछ भी नहीं सीख पाता। इमर्सन ने कहा है : ''हर शख्स, जिससे मैं मिलता हूं, किसी न किसी बात में मुझ से बढ़कर है। वही, मैं उससे सीखता हूं।''

एक दृश्य मुझे स्मरण आता है। मक्का की बात है। एक नाई किसी के बाल बना रहा था। उसी समय फकीर जुन्नैद वहां आ गये और उन्होंने कहा : ''खुदा की खातिर मेरी भी हजामत कर दें।'' उस नाई ने खुदा का नाम सुनते ही अपने गृहस्थ ग्राहक से कहा, 'मित्र, अब थोड़ी मैं आपकी हजामत नहीं बना सकूंगा। खुदा की खातिर उस फकीर की सेवा मुझे पहले करनी चाहिये। खुदा का काम सबसे पहले है।' इसके बाद फकीर की हजामत उसने बड़े ही प्रेम और भक्ति से बनाई और उसे नमस्कार कर विदा किया। कुछ दिनों बाद जब जुन्नैद को किसी ने कुछ पैसे भेंट किये, तो वे उन्हें नाई को देने गये। लेकिन उस नाई ने पैसे न लिये और कहा : ''आपको शर्म नहीं आती? आपने तो खुदा की खातिर हजामत बनाने को कहा था, रुपयों की खातिर नहीं!'' फिर तो जीवन भर फकीर जुन्नैद अपनी मंडली में कहा करते थे, ''निष्काम ईश्वर-भक्ति मैंने हज्जाम से सीखी है।''

क्षुद्रतम् में भी विराट संदेश छुपे हैं। जो उन्हें उघाड़ना जानता है, वह ज्ञान को उपलब्ध होता है। जीवन में सजग होकर चलने से प्रत्येक अनुभव प्रज्ञा बन जाता है। और, जो मू‌िर्च्छत बने रहते हें, वे द्वार आये आलोक को भी वापस लौटा देते हैं।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)


चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता


सत्य को चाहते हो, तो चित्त को किसी 'मत' से मत बांधो। जहां मत है, वहां सत्य नहीं आता। मत और सत्य में विरोध है।

सत्य की खोज के लिए मुक्त-जिज्ञासा पहली सीढ़ी है। और, जो व्यक्ति स्वानुभूति के पूर्व ही किन्हीं सिद्धांतों और मतों से अपने चित्त को बोझिल कर लेता है, उसकी जिज्ञासा कुंठित और अवरुद्ध हो जाती है।

जिज्ञासा- खोज की गति और प्राण है। जिज्ञासा के माध्यम से ही विवेक जाग्रत होता और चेतना ऊ‌र्ध्व बनती है। लेकिन, जिज्ञासा आस्था से नहीं, संदेह से पैदा होती है और इसलिए मैं आस्था को नहीं, सत्य-पथ के राही का पाथेय मानता हूं। संदेह स्वस्थ चिंतन का लक्षण है और उसके सम्यक अनुगमन से ही सत्य के ऊपर पड़े परदे क्रमश: गिरते जाते हैं और एक क्षण सत्य का दर्शन होता है।

यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आस्तिक और नास्तिक दोनों ही आस्थावान होते हैं। आस्था विधायक और नास्तिक दोनों ही प्रकार की होती है। संदेह चित्त की एक तीसरी ही अवस्था है। वह अविश्वास नहीं है और न ही विश्वास है। वह तो दोनों से मुक्त खोज के लिए स्वतंत्रता है।

और, सत्य की खोज वे कैसे कर सकते हैं, जो कि पूर्व से ही किन्हीं मतों से आबद्ध हें? मतों के खूंटों से विश्वास या अविश्वास की जंजीरों को जो खोल देता है, उसकी नाव ही केवल सत्य के सागर में यात्रा करने में समर्थ हो पाती है।

सत्य के आगमन की शर्त है : चित्त की पूर्ण स्वतंत्रता। जिसका चित्त किन्हीं सिद्धांतों में परतंत्र है, वह सत्य के सूर्य के दर्शन से वंचित रह जाता है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

जीना सोद्देश्य!


जीवन एक कला है। वह कैसे भी जी लेने का नाम नहीं है। वस्तुत: जो सोद्देश्य जीता है, वही केवल जीता है।
जीवन का क्या अर्थ है? हमारे होने का अभिप्राय? क्या है उद्देश्य? हम क्या होना और क्या पाना चाहते हैं?
जीवन में यदि गंतव्य का बोध न हो, तो गति सम्यक कैसे हो सकती है? और यदि कहीं पहुंचना न हो, तो संतृप्ति को कैसे पाया जा सकता है?
जिसे समग्र जीवन के अर्थ का विचार नहीं है, उसके पास फूल तो हैं और वह उनकी माला भी बनाना चाहता है, किंतु उसके पास ऐसा धागा नहीं है, जो उन्हें जोड़ सके और एक कर सके। अंतत: वह पायेगा कि फूल माला नहीं बन सके हैं और उसके जीवन में न दिशा है और न कोई एकता है। उसके समस्त अनुभव आणविक ही होंगे और उनसे उस ऊर्जा का जन्म नहीं होगा, जो कि ज्ञान बन जाती है। वह जीवन के उस समग्र अनुभव से वंचित ही रह जावेगा, जिसके अभाव में जीना और न-जीना बराबर ही हो जाता है। उसका जीवन एक ऐसे वृक्ष का जीवन होगा, जिसमें कि न फूल लगे, न फल लगे। ऐसा व्यक्ति सुख-दुख तो जानेगा, लेकिन आनंद नहीं। क्योंकि, आनंद की अनुभूति तो जीवन को उसकी समग्रता में अनुभव करने से ही पैदा होती है।
आनंद को पाना है, तो जीवन को फूलों की एक माला बनाओ। और, समस्त अनुभव को एक लक्ष्य के धागे से अनस्यूत करो। जो इससे अन्यथा करता है, वह सार्थकता और कृतार्थता को नहीं पाता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

ध्यान की विधि कैसे चुने!


हमेशा उस विधि से शुरू करें जो रुचिकर लगे। ध्यान को जबरदस्ती थोपना नहीं चाहिए। अगर जबरदस्ती ध्यान को थोपा गया तो शुरुआत ही गलत हो जाएगी। जबरदस्ती की गई कोई भी चीज सहज नहीं हो सकती। अनावश्यक कठिनाई पैदा करने की कोई जरूरत नहीं है। यह बात अच्छे से समझ लेनी है। क्योंकि जिस दिशा में मन की सहज रुचि हो, उस दिशा में ध्यान सहजता से घटता है।

जो लोग शरीर के तल पर ज्यादा संवेदनशील हैं, उनके लिए ऐसी विधि है, जो शरीर के माध्यम से ही आत्यंतिक अनुभव पर पहुंचा सकती हैं। जो भाव-प्रवण हैं, भावुक प्रकृति के हैं, वे भक्ति-प्रार्थना मार्ग पर चल सकते हैं। जो बुद्धि-प्रवण हैं, बुद्धिजीवी हैं, उनके लिये ध्यान, सजगता, साक्षीभाव उपयोगी हो सकते हैं।

लेकिन मेरी ध्यान की विधियां एक प्रकार से अलग हट कर हैं। मैंने ऐसी ध्यान-विधियों की संरचना की है, जो तीनों प्रकार के लोगों द्वारा उपयोग में लाई जा सकती हैं। उनमें शरीर का पूरा उपयोग है, भाव का भी पूरा उपयोग है और होश का भी पूरा उपयोग है। तीनों का एक साथ उपयोग है और वे अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग ढंग से काम करती हैं। शरीर, हृदय, मन- मेरी सभी विधियां इसी श्रंखला में काम करती हैं। वे शरीर पर शुरू होती हैं, वे हृदय से गुजरती हैं, वे मन पर पहुंचती हैं और फिर वे मनातीत में अतिक्रमण कर जाती हैं।

स्मरण रहे, जो हमें रुचिकर लगता है, उसी में हम गहरे जा सकते हैं- केवल उसी में गहरे जा सकते हैं। रुचिकर लगने का मतलब ही यह है कि उसका हमसे तालमेल है। हमारा छंद उसकी लय से मेल खाता है। विधि के साथ हम एक हार्मनी में हैं। तो जब कोई विधि रुचिकर लगे, तो फिर और-और विधियों के लोभ में न पड़े, फिर उसी विधि में और-और गहरे उतरें। उस विधि को प्रतिदिन या अगर संभव हो तो दिन में दो बार अवश्य करें। जितना हम इसे करेंगे, उतना आनंद बढ़ता जाएगा। किसी भी विधि को तभी छोड़े जब आनंद आना बंद बंद हो जाए। उसका मतलब है कि विधि का काम पूरा हो गया, अब दूसरी विधि की तलाश की जाए। कोई भी अकेली विधि हमें अंत तक नहीं ले जा सकती। इस यात्रा पर हमें कई बार ट्रेन बदलनी पड़ेगी। हर विधि हमें एक अमुक अवस्था तक पहुंचाएगी। उसके बाद उसका कोई उपयोग नहीं है। उसका काम पूरा हो गया।

दो बातें स्मरण रखनी हैं : जब किसी विधि में आनंद आए तो उसमें जितने गहरे जा सके जाएं। लेकिन उसके आदी न हो जाएं, क्योंकि एक दिन उसके पार भी जाना है। अगर हम उसके बहुत आदी हो जाते हैं, तो यह भी एक प्रकार का नशा है, फिर हम उसे छोड़ नहीं सकते। अब उसमें कोई आनंद भी नहीं आता-इससे कुछ मिलता भी नहीं-लेकिन यह एक आदत हो गयी। फिर चाहे तो इसे हम करते रह सकते हैं, लेकिन हम गोल-गोल घूमते है, यह उसके आगे नहीं ले जा सकती।

तो आनंद मापदंड है। जब तक आनंद आए, जारी रखें। आनंद का कण भी पीछे न छूट जाए। उसका पूरा रस निचोड़ लें, एक बूंद भी बाकी न बचे। और फिर उसे छोड़ने की भी तैयारी रखें। फिर कोई दूसरी विधि चुन लें, जिसमें फिर आनंद आता हो। हो सकता है, हमें कई बार विधि बदलनी पड़े। यह अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग होगा, लेकिन ऐसी बहुत कम संभावना है कि एक विधि से पूरी यात्रा हो जाए।

लेकिन बहुत सी विधियां एक साथ करने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि हम उलझन में पड़ सकते हैं, विपरीत प्रक्रियाएं एक साथ कर सकते हैं और तब तकलीफ होगी, दर्द होगा।

तो कोई भी दो ध्यान की विधियां चुन लें और फिर उन्हें सतत करें। असल में, मैं तो चाहूंगा कि कोई एक ध्यान ही चुनें, यह सबसे अच्छा होगा। जो ध्यान हमें भाए, उसे दिन में कई बार करना ज्यादा बेहतर है। इससे उसमें गहराई आती है।

अगर हम कई ध्यान एक साथ करते हैं- एक दिन एक, दूसरे दिन दूसरा। और हम अपने ही ध्यान गढ़ लेते हैं- तो ऊहापोह बढ़ेगा। विज्ञान भैरव तंत्र में ध्यान की एक सौ बारह विधियां हैं। हम पागल हो जा सकते हैं। हम वैसे ही पागल हैं!

ध्यान की ये विधियां कोई मनोरंजन नहीं हैं। ये कभी-कभी खतरनाक भी हो सकती हैं। हम मन के सूक्ष्म, अति सूक्ष्म यंत्र के साथ खेल रहे हैं। कभी एक छोटी सी चीज, जिसका हमें होश भी नहीं कि हम क्या कर रहे हैं, खतरनाक सिद्ध हो सकती है। इसलिए इन विधियों में कोई हेरफेर न करें और अलग-अलग विधियों को मिलाकर अपनी ही कोई खिचड़ी विधि न ईजाद करें। कोई भी दो विधियां चुन लें और कुछ सप्ताह उनका प्रयोग करके देखें।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

अहं-दृष्टिं का अवरोध


सत्य और स्वयं में जो सत्य को चुनता है, वह सत्य को पा लेता है और स्वयं को भी। और, जो स्वयं को चुनता है, वह दोनो को खो देता है।
मनुष्य को सत्य होने से पूर्व स्वयं को खोना पड़ता है। इस मूल्य को चुकाये बिना सत्य में कोई गति नहीं है। उसका होना ही बाधा है। वही स्वयं सत्य पर पर्दा है। उसकी दृष्टिं ही अवरोध है- वह दृष्टिं जो कि 'मैं' के बिंदु से विश्व को देखती है। 'अहं-दृष्टिं' के अतिरिक्त उसे सत्य से और कोई भी पृथक नहीं किये है। मनुष्य का 'मैं' हो जाना ही, परमात्मा से उसका पतन है। 'मैं' की पार्थिवता में ही वह नीचे आता है और 'मैं' के खोते ही वह अपार्थिव और भागवत-सत्ता में ऊपर उठ आता है। 'मैं' होना नीचे होना है। 'न मैं' हो जाना ऊपर उठ जाना है।
किंतु, जो खोने जैसा दीखता है, वह वस्तुत: खोना नहीं-पाना है। स्वयं की, जो सत्ता खोनी है, वह सत्ता नहीं स्वप्न ही है और उसे खेकर जो सत्ता मिलती है, वही सत्य है।
बीज जब भूमि के भीतर स्वयं को बिलकुल खो देता है, तभी वह अंकुरित होता है और वृक्ष बनता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

भीतर की यात्रा


सत्य स्वयं के भीतर है। उसे पहचान लेना भी कठिन नहीं, लेकिन उसके लिए अपने भीतर यात्रा करनी होगी। जब कोई अपने भीतर जाता है, तो अपने ही प्राणों के प्राण में वह सत्य को भी पा जाता है और स्वयं को भी।

पहले महायुद्ध की बात है, एक फ्रांसीसी सैनिक को किसी रेलवे स्टेशन के पास क्षत-विक्षत स्थिति में पाया गया था। उसका चेहरा इतने घावों से भरा था कि उसे पहचानना कठिन था कि वह कौन है। उसे पहचानना और भी कठिन इसलिए हो गया कि उसके मस्तिष्क पर चोट आ जाने से वह स्वयं भी स्वयं को भूल गया था। उसकी स्मृति चली गई थी। पूछे जाने पर वह कहता था, ''मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं और कहां से हूं?'' और यह बताते ही उसकी आंखों से आंसुओं की धार लग जाती थी। अंतत: तीन परिवारों ने उसे अपने परिवार से संबंधित होने का दावा किया। वह तीनों परिवारों से हो यह तो संभव नहीं था, इसलिए उसे क्रमश: तीनों गांवों में ले जाकर छोड़ा गया। दो गांवों में तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ की भांति जाकर खड़ा हो गया। किंतु तीसरे गांव में प्रविष्ट होते ही उसकी फीकी आंखें एक नई चमक से भर गई। और उसके भाव-शून्य चेहरे पर किन्हीं भावों के दर्शन होने लगे। वह स्वयं ही एक छोटी गली में गया और फिर एक घर को देखकर दौड़ने लगा। उसके सोये-से प्राणों में कोई शक्ति जैसे जग गई हो, वह पहचान गया था। उसका घर उसकी स्मृति में आ गया था। उसने आनंद से विभोर होकर कहा था, ''यही मेरा घर है और मुझे स्मरण आ गया है कि मैं कौन हूं!''

ऐसे ही हममें से प्रत्येक साथ हुआ है। हम भूल गये हैं कि कौन हैं, क्योंकि हम भूल गये हैं कि हमारा घर कहां है। अपना घर दीख जावे, तो स्वयं को पहचान लेना सहज ही हो जाता है।

जो व्यक्ति बाहर ही यात्रा करता रहता है, वह कभी उस गांव में नहीं पहुंचता, जहां कि उसका वास्तविक घर है। और वह न पहुंचने से वह स्वयं तक ही नहीं पहुंच पाता है। बाहर ही नहीं, भीतर भी एक यात्रा होती है, जो स्वयं तक और सत्य तक ले जाती है।

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

'मैं' का ताला


मैं से बड़ी और कोई भूल नहीं। प्रभु के मार्ग में वही सबसे बड़ी बाधा है। जो उस अवरोध को पार नहीं करते, सत्य के मार्ग पर उनकी कोई गति नहीं होती।

एक साधु किसी गांव से गुजरता था। उसका एक मित्र-साधु भी उस गांव में था। उसने सोचा कि उससे मिलता चलूं। रात आधी हे रही थी, फिर भी वह मिलने गया। एक बंद खिड़की से प्रकाश को आते देख उसने उसे खटखटाया। भीतर से आवाज आई, 'कौन है?' उसने यह सोचा कि वह तो अपनी आवाज से ही पहचान लिया जावेगा, कहा, 'मैं।' फिर भीतर से कोई उत्तर नहीं आया। उसने बार-बार खिड़की पर दस्तक दी उत्तर नहीं आया। ऐसा ही लगने लगा कि जैसे कि वह घर बिलकुल निर्जन है। उसने जोर से कहा, 'मित्र तुम मेरे लिये द्वार क्यों नहीं खोल रहे हो और चुप क्यों हो?' भीतर से कह गया, 'यह कौन ना समझ है, जो स्वयं को 'मैं' कहता है, क्योंकि 'मैं' कहने का अधिकार सिवाय परमात्मा के और किसी को नहीं है।'

प्रभु के द्वार पर हमारे 'मैं' का ही ताला है। जो उसे तोड़ देते हें, वे पाते हैं कि द्वार तो सदा से ही खुले थे!

(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)

क्षण का मूल्‍य



शाश्वत क्षण में छिपा है और अणु में विराट। अणु को जो अणु मानकर छोड़ दे, वह विराट को ही खो देते हैं। क्षुद्र में ही खोदने से परम की उपलब्धि होती है।
जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है। और किसी भी क्षण का मूल्य किसी दूसरे क्षण न ज्यादा है, न कम है। आनंद को पाने के लिए किसी अवसर की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है। जो जानते हैं, वे प्रत्येक क्षण को ही आनंद बना लेते हैं। और, जो अवसर की प्रतीक्षा करते हैं, वे जीवन के अवसर को खो देते हैं। जीवन की कृतार्थता इकट्ठी और राशिभूत नहीं मिलती है।
एक साधु के निर्वाण पर उसके शिष्यों से पूछा गया था कि दिवंगत सद्गुरु अपने जीवन में सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात कौन-सी मानते थे? उन्होंने उत्तर में कहा, 'वही जिसमें किसी क्षण वे संलग्न होते थे।'
बूंद-बूंद से सागर बनता है। और क्षण-क्षण से जीवन। बूंद को जो पहचान ले, वह सागर को जान लेता है। और, क्षण को जो पा ले, वह जीवन पा लेता है।
(सौजन्य से : ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन)